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Wednesday, 25 April 2018

गुरुदेव जीवन परिचय

परम पूज्य श्री १००८ श्री गुरु टेकचन्द जी महाराज का जीवन परिचय 
प्रादुर्भाव - वैशाख शुक्ल पूर्णिमा वि.स. १८०५ (1805) सन १७४८ (1748)
समाधि - आश्विन शुक्ल पूर्णिमा वि. स. १८६८ (1838) सन १७८१ (1781)
 
 हिंदुस्तान धर्म प्रधान देश है ! भारतीय संस्कर्ती में अनेक सम्प्रदाए एवं जातिया है ! यह इसकी विशेषता है जिसके कारण अतिक्रमणों के बाद भी आज तक इस धर्म में अनेक ऋषि , मह्रिषी , साधु सन्यासी संत महात्माओ एवं सत्पुर्शों का पदार्पण हुए है इस्सी श्रंखला में पूज्य श्री १००८ गुरु टेकचन्द जी महाराज ने जन्मलिया है ! जिन्होंने अपने जन हितेषी कार्यों से भारतीय संस्कृति , साहित्य एवं इतिहास को वृद्धि करते हुए उन्हें अक्षुण बनाये रखा   !
मध्यकालीन भक्ति युग में मीराबाई , तुलसीदास , सूरदास , तुकाराम ज्ञानेश्वर , नामदेव , आदि अन्य संत कवी , भक्तों के  साथ ही श्री टेकचन्द जी महाराज भी हुए है ! इनके जीवन के संत श्री कबीर दासजी एवं वैष्णव भक्त का अभूत पूर्व समन्वय था !
संत समाजभूषण  श्री टेकचन्दजी महाराज का जन्म ग्राम आलरो म . प्र , के मालवा क्षेत्र में जिला शाजापुर के मक्सी रेलवे स्टेशन के पास झोंकर से डेढ़ कि.मी . दूरी पर ग्राम आलरी में दामोदर वंशीय जुना  गुजराती  क्षत्रिय समाज के एक गरीब किन्तु सम्मानित  परिवार में विक्रम संवत १८०५ में वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन हुआ था ! वर्तमान में यह गाँव देवास जिले में आता है ! इनके दादाजी सर्व श्री हीरालालजी , दलपतजी , व चंद्रभानजी तीन भाई थे ! इनमे से श्री हीरालालजी ग्राम खरेली में झोंकर एवं श्री चंद्रभानजी ग्राम आलरी आ गए थे ! श्री दलपतजी ग्राम खालेरी में ही रहे !
         इनके पिताजी श्री चंद्रभानजी के पुत्र श्री उदयरामजी व माता रुख्मनीबाई थी ! इनका प्रचलित गीत मंडोवरा पडिहार और गोतर पराशर था ! इनकी  माता सोन्य सोलंकी परिवार कि थी ! वे मक्सी कि रहेने वाली थी ! उनका जन्म स्थान आलरी ग्राम ग्वालियर राज्य में आता था ! ग्वालियर राज्य में महाराजा सिंधिया राज्य करते थे ! जब सटी साध्वी रुख्मणि बाई की पवित्र कोख से श्री टेकचन्दजी महाराज ने जन्म लिया उस समय गाँव के समस्त नर नारियों को ऐसा आनंद हुआ सकल तीर्थ इस ग्राम आलरी में प्रकट हो गए हो ! जो माता बहिन इस बालक को देखती वह कुछ पल के लिए एकटकी  सी बंधकर  देखा  करती थी क्योकि होनहार बालक के चिन्ह ऐसे ही होते है जब से टेकचन्दजी का जन्म हुआ घर में सुख शांति अवं सम्पन्नता पहले से बढ़ने लगी ! उनके पिता श्री उदयरामजी कपड़ों का व्यापार करते थे ! जब बालक टेकचन्दजी की बोली खुली तो सत्य नाम ॐ का ही उच्चारण हुआ था ! इनकी माता ने बड़े लाड प्यार से पालन पोषण किया !
    पांच वर्ष की अवस्था में उन्हें पाठशाला भेजा गया ! ग्राम में रहने  के कारण उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कोई विशेष नहीं हो सकी ! परन्तु इश्वर भक्ति और सत्संग को बड़े चाव से सुनते थे ! ग्यारह वर्ष की आयु में उन्हें याग्योबीत धारण कराया गया था ! बारह वर्ष की आयु में पिताजी ने इन्हें भी सिलाई के काम पर बैठा दिया तथा हाट बाजार करने के लिए भी साथ ले जाने लगे थे !
            घर में धार्मिक वातावरण होने से श्री टेकचन्दजी की विचारधारा बचपन से ही धार्मिक रही ! एक समय की बात है श्री उदयराम जी को मोतिझिरा एवं खासी से तकलीफ हने पर तबियत कुछ नरम थी ! अपनी धर्म पत्नी से कहा की मेरी तबियत नरम है ! अतः धर्म पत्नी ने उन्हें गर्म दूध क साथ दवाई दी और कहा की आपको अपना कारोबार बच्चों को सोप देना चाहिए ! धंधा न कर सकने के कारण उन्होंने अपनी पत्नी की सलाह से तीनो पुत्रों को बुलाया ! उनके नाम अमीचंद , तुलसीराम अवं टेकचन्द थे ! जब उन्हें बुलाया तब वे अन्य बच्चों के साथ भक्त के रूप में भजन कीर्तन गा-गा कर खेल रहे थे ! उनके कीर्तन का मुखड़ा था : - 
है ! नन्द नंदन असुर निकंदन ,भवभय भंजन  हारे या !
विपिन बिहारी जनमन हारी, श्याम बांसुरी  वारे या !!
भक्त जनन के अरु कवियन  के , मन मंदिर उजियारे आ !
भारत भाग्य उदय करने, मेरे श्री कृष्णा प्यारे आ !!  
माता पिता के बुलावे का आभास पाकर वे घर आये ! पिताजी ने तीनो भाई से कहा बाजार हाट जाकर कपड़े बेचोगे तो अच्छा होगा ! क्योकि मेरी हालत ठीक नहीं है और में तुम्हारे साथ बाजार हाट करने  के लिए भी असमर्थ हु ! पिताजी की इस आज्ञा का पालन करने तीनो भाई तैयार हो गए ! अमिचंदर और तुलसीराम को एक गाँव तथा टेकचन्दजी को दुसरे गाँव भेजा ! साथ ही उन्होंने कुछ व्यापारियों हरिरामजी , रतीरामजी , गोविन्दजी , आदि  के नाम बताये ! श्री टेकचन्दजी ने प्रस्थान करने से पूर्व मन  ही मन इश्वर का स्मरण करते हुए प्रार्थना की प्रभु मुझे इस कार्य को सच्चे रूप से निभाने की शक्ति दे और बाद में वे माता - पिता को नमन कर प्रस्थान किया ! बाजार में अपनी दुकान लगा कर कपड़े बेचने लगे सबने देखा की ये नया व्यापारी लड़का कोन है ? तब टेकचन्दजी ने कहा की आपने मुझे कभी नहीं देखा यहा में नया हूँ परन्तु में उदयरामजी का पुत्र हूँ ! सब दूकानदार भी अपने अपने काम में लग गए ! 
         उस दिन बाजार में टेकचन्दजी के माल की बिक्री अच्छी हुई ! इसे देखकर कुछ व्यापारी जलन करने लगे ! दुसरे हाट में टेकचन्दजी ने अपनी दुकान अन्य व्यापारियों के साथ लगाई ! उसमे बिक्री बहुत हुई ! कभी तो ऐसा भी हुआ की उन्होंने आधे दाम में ही कपड़ा दे दिया ! जिसे देखकर अन्य व्यापारी टेकचन्द के पिता उदयरामजी के पास जाकर कहने लगे की तुम्हारे लड़के ने तो बहुत कम दाम में कपड़ा बेच दिया ! ग्राहक की दयनीय अवस्था को देखकर एक दो को बिना पैसे लिए ही माल दे दिया ! जिसे देखकर अन्य व्यापारी टेकचन्दजी के पिता उदयरामजी के पास जाकर कहने लगे की तुम्हारे लड़केप ने तो बहुत कम दाम में कपड़ा बेच दिया है ! इससे बाजार भाव पर बुरा असर पड़ता है ! उसकी सत्यता की जानकारी उन्ही के सामने लेने पर उनके पिताजी ने जितना माल दिया था वहा रुपये का हिसाब पूरा पाया ! जिसे देखकर माता-पिता एवं व्यापारी वर्ग आश्चर्य चकित रह गए ! 

सत्संग का प्रभाव 

   इसके बाद एक समय की घटना है की टेकचन्दजी मक्सी से बाजार करके घर लौट रहे थे ! रस्ते में साधू संतों की एक टोली मिली ! आपने सब रकम उनके लिए खर्च कर दी और खाली हाथ घर वापस आ गए! उस दिन पहले की भांति हिसाब नहीं बताया सुबह होते ही फिर सब के सब दूकानदार उदयरामजी के यहाँ आकर टेकचन्दजी के विरुद्ध कई प्रकार की बातें बनाकर कठोर शब्दों में उलाहना देने लगे ! एक ने तो ये तक कहे दिया की तुम्हारे बेटे ने क्या हिसाब दिया की उसके इतनी तरफदारी कर रहे हो ! वह हिसाब क्या बताएगा उसने तो सारा का सारा धन साधू संतों को दे दिया था ! और वह खाली हाथ घर आया है ! इस बात ने अग्नि में जलती हुई आहुति सा काम किया ! उदयरामजी ने तमतमाते हुए उन लोगों के सामने टेकचन्दजी को बुलाया और कहा तुम्हारे कारण मेरे साथी इतना कष्ट उठाते है यहाँ में सहन नहीं कर सकता ! कल चुपचाप आया और सो गया मुझे हिसाब तक नहीं बताया ! सारा पैसा साधू संतों को खिलाकर खाली हाथ घर आया ! इस पर टेकचन्दजी ने कहा मेने उन्हें (दुकानदारों) को कोनसा कष्ट दिया है ! आप सच मानिये साधू संतों के बारे में संत कबीरदासजी ने कहा है –
       साधू हमारी आत्मा , हम साधू के जीव 
       साधू में यूँ राम रहा , जो गो रस में घीव 
       संत हमारी आत्मा , हम संतान के देह 
       साधू में यूँ राम रहा , जो बदल में मेह ! 

यह सुनकर पिताजी बोले चल बड़ा आया , मुझसे बड़ी बड़ी ज्ञान की बातें करता है उनको परेशान करके पूछता है कोनसा कष्ट ! एकदम क्रोध में आकर उनके पिताजी ने कहे दिया की अभी चले जाओ मेरे सामने से ! में कुछ सुन्ना नहीं चाहता ! जहाँ तुम जाना चाहो जा सकते हो ! अब तुम मेरे घर में पैर मत रखना ! तुमने घर को बदनाम कर दिया है ! मूर्ख ! 

                                   गृह त्याग 

श्री टेकचन्दजी ने पिता के मुख से इस प्रकार के शब्द सुने तो उनके कोमल ह्रदय को गहरा आघात पंहुचा ! उन्होंने अपने मन में अपनी आत्मा से ध्यान कर जान लिया की इस नश्वर संसार में इश्वर के बिना और कोई  मददगार नहीं है ! सदभाव से उस इश्वर का भजन पूजन करना ही अच्छा है ! ऐसा विचार कर अपने माता पिता भाई बहिन आदि सभी पूजनीय लोगों को मन ही मन प्रणाम कर पिता की आज्ञा शिरोधार्य करके घर छोड़कर निकल गए ! जिस हालत में पिताजी के सामने खड़े थे वैसे ही चले गए ! 
रास्ते में जाते हुए इश्वर को विनय के साथ भजते जाते थे :- 

                             विनम्र प्रार्थना
प्रभु सत्य का पथ बता दो मुझे !
आवागमन के दुःख से चुद लो मुझे !!
प्रभु चरणों की शरण में लागलो मुझे !१ प्रभु सत्य का ..........
पड़ा हु जंजाल जगत में , घोर अविध तम जहाँ !
कामादि ब्याल कराल घेरे , आहार निशि रहते तहां !!
ऐसे काल के गाल से , बचालो मुझे !! प्रभु सत्य का .......
उटाह रही तराशना की अग्नि , वासना झाल उड़  रही ! 
धुँआ कर्म का छाया चहु दिशि , गेल स्वजाति में नहीं !
अपने चरणों का सहारा , दिल दो मुझे !! प्रभु सत्य का .......
माया के परदे नेत्र पर है , सूझता सत्पंथ नहीं !
अगर आप भी छोड़ दोगे, फिर ठिकाना नहीं कही !!
अपने चरणों की शरण में , लगालो मुझे !! प्रभु सत्य का ........
रो रो पुकारू तुझे , अब तो सद्गुरु दो दर्शन !
तेरे सिवा नहीं कोई , जो हरे संकट भगवन !!
अब तो सुक्र्त सव्देश में , पौच दो मुझे !! प्रभु सत्य का ........
' टेकचन्द ' उस प्रभु कृपा से , जपले सिकर्ट नाम ! 
इश्वर इस संसार में , संग चले सतनाम !!
सतगुरु सतनाम सवरूप , दिखा दो मुझे !! प्रभु सत्य का ........

 उनके घर से चले जाने पर माता रुख्मणि  को बहुत दुःख हुआ और उदयरामजी ने भी क्रोध शांत होने पर उदास स्वर में कहा देवी संसार का यहाँ नियम है की मनुष्य पर जब प्रभु कृपा करते है तो ऐसा ही  होता है ! अतः जब धीरज से ही काम लेना है ! पत्नी बोली की कोई ऐसा उपाय करो जिससे मेरा पुत्र मुझे फिर से मिल जाए! पिता के अनेक उपाय करने पर भी वे घर नहीं लोटे ! जो लेने गए थे उन्हें समझा कर वापस कर दिया ! जैसे तेसे मन मरकर रहेने लगे ! समय आने पर उदयरामजी ने दोनों बच्चों अमिचंद्र अवं तुलाराम का विवाह अच्छा घर घराना देखकर कर दिया ! सारे परिवार के लोग आनंद से रहेने लगे लेकिन टेकचन्दजी की अनुपस्थिति खलती रही उन्होंने विक्रम सम्वत १८२३ सन १७६६ में गृह त्याग किया उस समय उनकी उम्र १८ वर्ष की थी ! अभी तक श्री टेकचन्दजी सांसारिक जीवन पर सवार थे किन्तु घर से निकलने के पश्चात् अपने जीवन को सार्थक बनाने के किये भक्ति व ज्ञान के सागर में तेरते रात दिन प्रभु के चरणों को अपने ह्रदय में धारण कर गाँव-गाँव घुमते फिरते रहे ! श्री टेकचन्दजी महारज को भी माता- पिता तथा भाई बहन की याद कुछ दिनों तक आती रही ! किन्तु ज्यो ज्यों ज्यों भगवत भजन एवं सत्संग में रमते गए त्यों त्यों याद बिसरते गए ! लगाव कम होता गया और एक समय ऐसा आया जब उनके ज्ञान चक्षु खुल जाने से वे गृहस्थ जीवन से मुक्त हो गए !
                                     गुरु दीक्षा 
विक्रम सम्वत १८२४ सन १७६७ में घुमते घुमते एक दिन वे उन्हेल नाम के गाँव में पहुचे ! उन्हेल में कबीर पंथी एक संत श्री परसरामजी महाराज निवास करते थे ! वही उन्हें उनका सत्संग मिला जिससे प्रभावित होकर उस अत्यंत ही सुन्दर एवं रमणीय स्थान पर यदि मुझे अपना शिष्य बनाकर रहेने का मोका दें तो कितना अच्छा हो , ऐसा विचार कर श्री टेकचन्दजी  ने श्री गुरु परसरामजी के पास जाकर साष्टांग प्रणाम किया और आज्ञा पाकर कहा- गुरु महाराज आप मुझे अपना शिष्य बना लें जिससे आपके चरणों की सेवा करके कृतार्थ हो जाऊ ! यहाँ वचन सुनकर श्री गुरु महारज परसरामजी ने सार रहस्य व चमत्कार पहचान लिया और कुछ सोच कर कहा बेटे तेरे माता पिता धन्य है जिन्होंने तेरे जैसे पुत्र को जन्म दिया ! में तुम्हे अपना शिष्य अवश्य बनाऊंगा ! तुम अभी आश्रम में ही रहो ! आश्रम के सभी शिष्यं को बुलाकर कहा - टेकचन्द यही रहेगा तथा शुभ दिन व समय देखकर दीक्षा दी जाएगी ! कुछ दिन बीतने के बाद विक्रम सम्वंत १८२५ सन १७६८ में वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्री गुरु परसरामजी महाराज ने श्री टेकचन्दजी को साधू संत होने की गुरु दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया ! उनके बारह गुरु भाई एवं एक गुरु बहिन थी जिनके नाम निम्नुसार है :- 
१ श्री भीखारिदासजी  
२ श्री मोतिदासजी
३ श्री मनोहर दासजी 
४ श्री आत्मदासजी   
५ श्री तेजुदासजी
६ श्री गणेश्दासजी
७ श्री सिद्धनाथजी 
८ श्री गरीबनाथजी 
९ श्री केवलनाथजी  
१० श्री ऐकनाथजी 
११ श्री सिंगाजी महाराज 
१२ श्री रामजी बाबा 
१३ बाई रामदास 
    सभी शिष्यों से गुरूजी बाई रामदास को अधिक चाहते थे ! श्री टेकचन्दजी सभी शिष्यों में बहुत ही चतुर एवं ज्ञान के धनि थे ! धीरे - धीरे गुरूजी का स्नेह श्री टेकचन्दजी के प्रति बढ़ता गया ! श्री टेकचन्दजी भजन भी बहुत गया करते थे ! इनकी वाणी बहुत मधुर थी वे अपने गुरुभाइयों के साथ भी सहिष्णुता का व्यव्हार रखते थे ! आश्रम में सत्संग पाकर भक्त टेकचन्द रात दिन इश्वर चर्चा में मगन रहेते थे ! इश्वर चर्चा में इनका विवेक रुपी भण्डार अगम्य व अक्षय होने लगा ! उनकी क्षमा की विचारधारा  आत्म्यता  से परिपूर्ण तथा उच्च कोटि की होती थी जिससे स्वयं गुरु परसरामजी भी अत्यंत प्रभावित होकर उनके ह्रदय से प्यार  करने लगे ! श्री टेकचन्दजी को अपने गुरु की सेवा करते तपस्या में १२ वर्ष व्यतीत हो गए ! वि . सं . १८३४ सन १७८० में एक दिन संत श्री परसरामजी महारज ने अपने सभी शिष्यों को बुलाकर तीर्थ यात्रा के विचार से अवगत कराया ! साथ ही श्री टेकचन्द जी को अपनी अनुपस्थिति में आश्रम का उत्तराधिकारी बनाने की भी जानकारी दी और कहा जब तक में वापस नहीं आ जाता तब तक यहाँ की सम्पूर्ण जवाबदारी टेकचन्द को सोंप रहा हूँ !गुरु परसरामजी ने बाई रामदास को पास बुलाया और कहा की मेरे बाद तुम टेकचन्द को ही गुरु मानना ! जिस प्रकार से मेरी सेवा करती हो उसी प्रकार से उनकी करना ! परन्तु बाई रामदास को यहाँ बात अच्छी नहीं लगी क्योकि टेकचन्द अभी गुरु के योग्य नहीं है ! वह अभी इतना सिद्ध पुरुष नहीं हो गया है जो हम उनकी सेवा करें ! इस पर टेकचन्दजी ने कहा बहन तुम सच कहेती हो आपका यहाँ तुच्छ सेवक  कहाँ - भला जुगनू की तुलना सूर्या से ! ऐसा नहीं होना चाहिए ! यहाँ सुनकर गुरु परसरामजी ने सभी को कहा तुम्हे गुरु की आज्ञा का पालन करना चहिये जो गुरु की बात टालता है वह सच्चा संत नहीं बन्न सकता ! उससे साधू नहीं होना चहिये ! बिना सेवा किये आत्मा निर्मल नहीं हो सकती ! बाई रामदास का विरोध देखकर गुरूजी ने तीर्थयात्रा का विचार स्तगित कर दिया ! सभी आनंद पूर्वक रहेने लगे ! 
    गुरु आश्रम का त्याग 
             बाई रामदास की व गुरूजी की बात सुनकर श्री टेकचन्दजी को झटका लगा और उन्होंने अपना मन में विचार किया क्यो गुरूजी मुझे बढ़ा भारी त्यागी समझकर मेरी गुरु बहन को सेवा में भेज रहे है ! यदि में यहाँ मुझे बड़ा भारी त्यागी समझ कर मेरी गुरु बहिन को सेवा में भेज रहे है ! यदि में यहाँ रहेता हु तो गुरु भाइयों का द्वेष बढेगा द्वेष बढ़ाना अपना काम नहीं है , अपना काम तो दीन दुखी जीवों की सेवा करना और सत्य का उपदेश देना है ! अतः इन सब बातों से बचने क लिए मुझे आश्रम छोड़ देना चहिये ! ऐसा विचार कर श्री टेकचन्द जी ने गुरु भाइयों व बहनों को दंडवत प्रणाम करके अर्ध रात्रि में बिना गुरूजी से मिले चुपचाप वहां से भ्रमण करने निकल पड़े !सुबह होने पर श्री गुरूजी परसरामजी को सारी घटना मालूम पड़ी तो अत्यंत दुखी हुए ! संत श्री परसरामजी ने सभी शिष्यों को बुलाकर कहा ऐसा मालूम होता है की टेकचन्द आश्रम छोड़कर कही चला गया है टेकचन्द वास्तव में आश्रम में सर्व शिरोमणि विद्वान था ! संत बोले हमारे टेकचन्द का आदर्श , ईश्वर भक्ति  में लगन , गुरु से अद्वितीय थी , शिष्यों ने कहा - हमारी अखंड सुमरनी का एक महत्वपूर्ण मनका कम हो गया ! हम तो उनकी तुलना में पासंग भी नहीं !उन पर प्रभु की असीम अनुकम्पा थी ! बातचीत करते करते श्री परसरामजी व अन्य शिष्यों का मन भी श्री टेकचन्द जी के आभाव में खिन्न हो गया ! 
   परसरामजी ने जगह जगह भक्तों को भेजकर अपने शिष्य टेकचन्द की तलाश कराई जब कही पता नहीं लगा तो वे सब इस बात पर उतारू हो गए की आज नहीं तो कल हम टेकचन्द को ढूँढकर ही रहेंगे ! 
अवंतिका आगमन 
    उधर गुरु आश्रम से निकलने के बाद श्री टेकचन्द जी भटकते भटकते उज्जैन नगरी में पहुच गए वहां पर भक्त शिरोमणि मीराबाई का एक बड़ा सुन्दर स्थान बना हुआ था उस स्थान पर संत श्री टेकचन्दजी ने अपना आसन जमा लिया ! धीरे धीरे उनकी प्रतिमा दिन दोगुनी रात चोगुनी बढ़ने लगी ! दिन रात मण्डली चाहे साधू हो या गृहस्थी मिलने व सत्संग करने को आने लगे ! उस साधारण प्राणी ने वह जादू कर दिया था की जो वहां आश्रम पहुच जाता उसका आश्रम छोड़ने को जी नहीं करता था देखते  देखते सेकड़ों व्यक्ति श्री टेकचन्दजी महाराज के प्रवचन को सुनकर इश्वर में श्रद्धा रखने लगे और उन्हें अपना गुरु मानने लगे ! गुरु दीक्षा देने का कार्य भक्तों के आग्रह होने पर स्तगित रखा ! उनका कहना था की तीर्थ यात्रा करने के बाद ही में यह कार्य हाथ में लूँगा ! दिन प्रतिदिन भक्तों की श्रद्धा अधिकाधिक बढ़ने लगी इनके परिणाम स्वरूप भक्तों द्वारा एक श्री राधा कृष्णा मंदिर का निर्माण किया तथा उनके चरणों के चरण पादुका की ! जो आज भी ब्राहमण गली बहादुरगंज में स्थापित है! 
             उज्जैन में रहते उन्होंने अपने प्रवचन में कहा - यहाँ संसार माया मोह से लिप्त हुआ है ! इससे प्राणी मात्र को विर्रक्त रहेना ही हितकर है ! तभी एक भक्त ने प्रशन किया स्वामी गृहस्थ में फस प्राणी इस माया मोह से कैसे अलग हो सकता है ?
             इस पर श्री टेकचन्द जी ने कमाल का उदाहरण देकर कहा - अवश्य हो सकता है जिस प्रकार कमल पर जल डालने से कमल का पत्ता गोल नहीं होता वरन जल को नीचे गिर देता है उस प्रकार ग्रहस्त में रहकर के मनुष्य मुक्ति को प्राप्त कर सकता है ! त्याग तो करना ही होगा ! कलयुग में तो सांसारिक प्राणी के थोड़े से श्रम से प्रभु प्रसन्न होते है ! प्रभु का स्मरण सच्चे भाव से जो करता है , चाहे वह अल्पसमय के लिए ही क्यों न हो , घाट घाट के अंतर्यामी प्रभु उसकी पुकार अवश्य सुनते है !    
                                      तीर्थ यात्रा 
           एक दिन श्री टेकचन्द जी महाराज ने अपनी तीर्थ यात्रा की इच्छा भक्तों के सामने रखी सभी उपस्थित  भक्तों ने मिलकर उनके खर्च हेतु धन राशी एकत्रित कर भेंट की , परन्तु उन्होंने आश्रम की व्यस्था हेतु वापिस कर दिया और कहा की मुझे एक पैसा भी नहीं चहिये प्रभु खुद मेरी पूर्ती करता है सो इसे में क्यों अपने पास रखु ! दुसरे दिन सबेरे ही  सब भक्तों ने अत्यंत श्रद्धा से श्री टेकचन्दजी महाराज को भगवान श्री महाकालेश्वर के दर्शन के पश्च्यात तीर्थ यात्रा हेतु प्रस्थानित कर भाव पूर्ण विदा किया ! श्री टेकचन्दजी महारज ने अपनी तीर्थ यात्रा उज्जैन से चित्र शुक्ल पक्ष पुष्य नक्षत्र में विक्रम सम्वत १८४१ सन १७८४ में प्रारम्भ की !  
उज्जैन से ओंकारेश्वर होते हुए काशी पहुंचे काशी में आपका कई साधू संतों एवं इश्वर भक्तों से संपर्क हुआ ! वही रहकर कुछ समय इश्वर भजन एवं सत्संग में व्यतीत किया ! और विश्वनाथ के दर्शन का लाभ लिया ! तत्पश्यात आपने चारो धाम बद्रीनाथ , केदारनाथ , जगन्नाथ , रामेश्वर और द्वारिका की यात्रा की ! संत श्री टेकचन्दजी महाराज तीर्थ यात्रा करते हुए मथुरा , वृन्दावन , हरिद्वार , अमरनाथ , प्रयाग , चित्रकूट , मदुराई कशी कांची , श्री शैलम , तिरुपति , भीमशंकर , बैजनाथ त्रयम्बकेश्वर , सोमनाथ , जुनागड़ , गिरनार , डाकोर , नाथद्वारा , पुष्कर आदि मुख्या - मुख्या स्थानों पर होते हुए एवं प्रमुख  नदियाँ गंगा , यमुना , गोदावेरी , कृष्णा , सरयू , कावेरी , नर्मदा आदि में स्नान करते हुए आश्विन शुक्ल पक्ष में विजयादशमी के दिन विक्रम संवत १८४७ सन १७९० में वापस उज्जैन आकर शिप्रा (शिवप्रिया) में स्नान करके महाकालेश्वर के दर्शनकर तीर्थ यात्रा समाप्त की ! 
                       गुरु पद को प्राप्ति 
     उज्जैन के भक्तों को इसकी सूचना पूर्व में ही मिल चुकी थी ! संत श्री टेकचन्दजी महाराज के उज्जैन आते ही भक्त लोगों ने महाकाल मंदिर पहुंचकर उनका भव्य स्वागत किया ! सभी लोगों ने दंडवत प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया बाद में हाथी पर उनकी सवारी  महांकालेश्वर मंदिर से निकली जो उज्जैन के प्रमुख मार्गों से होती हुई श्री राधाकृष्ण मंदिर पहुची ! तीर्थ यात्रा से आने के नाद उन्होंने भक्त जनों के आग्रह पर गुरु मन्त्र देना प्रारम्भ किया जिससे वे गुरूजी कहलाये ! प्रबल इश्वर भक्ति के कारण संत कहलाये ! 
                       प्रस्थान 
     तीर्थ यात्रा के समय मार्ग में न-न प्रकार के उच्च कोटि के संत महात्माओं , महंतों , महापुरसों एवं भगवत भक्तों से भी सत्संग करने का अवसर प्राप्त हुआ ! उससे आपके व्यक्तित्व में एक महान परिवर्तन आ गया था ! आप सह्न्ति एवं गाम्भीर्य के प्रतिरूप बन गए थे ! उनके गुरु परसरामजी के द्वारा बताई संत कबीर की बात याद आने पर श्री टेकचन्दजी महाराज ग्राम झोंकर में संत कबीर मंदिर के दर्शन करने की इच्छा से मक्सी होते हुए कार्तिक शुक्ल एकादशी वि.सं.१८४७ सन १७९० के दिन ग्राम झोंकर पहुचे ! वहां का वातावरण उन्हें बहुत ही शांत एवं स्वच्छ  मालूम हुआ ! संत श्री टेकचन्दजी महाराज ने अपना आसन कबीर मंदिर में ही जमाया ! वहां पर मंदिर के पास ही एक बड़ा इमली का पेड़ था !
एक बार श्री गुरु महाराज संत श्री टेकचन्दजी ने अपने संयम को अडिग बनाने एवं अधिक अत्यामिक ज्ञान को वृद्धि हेतु ग्राम झोंकर में इमली के पेड़ के पास ही नवरात्री में वि.सं. १८४९ सन १७९२ में ८ दिन की समाधी ली थी जिससे उनका वर्चस्व पास के गाँव में दूर दूर तक फ़ैल गया और भक्तों द्वारा समाधी के पास ही सुभ वहां कीर्तनं होता था ! आठ दिन की अविरल समाधी लेने के पश्च्यात संत अपनी मुद्रा भंग करके वास्तविक स्थिति में आये ! उन्हें फलों का रसपान कराया ! गगन भेदी आवाज़ से उपस्थित जन समुदाय ने जय-जयकार की !
                      झोकर में चमत्कार 
 ग्राम झोकर में एक दिन किसी बेलगाडी से एक बछिया कुचलकर मर गई ! वहां के लोगों ने संत की परीक्षा लेने के लिए की यहाँ कोई ढोंगी तो नहीं है , श्री टेकचन्दजी के पास गए और इसी बिछिया को जिन्दा करने का आग्रह किया ! श्री टेकचन्दजी ने कहा सतगुरु संत कबीर ने ऐसे कितने ही मरे हुए जीवों को इश्वर कृपा से जिन्दा कर दिया है ! वे ही सर्वेश्वर श्री  हरी अब जीवन दान देंगे ! ऐसा कहकर  संत श्री टेकचन्दजी महाराज ने अपना दाया हाथ मन ही मन सत्यनाम का उच्चारण कर उस मरी हुई बिछिया को छू दिया ! वह जिंदा होकर सत्गुरुदेव की अपनी भाषा में स्तुति की और चरण चूमने लगी ! 
           यहाँ पर करीमदास नाम के भक्त हुए है ! ! पूर्व में उनका नाम करीम खान था ! उब्जे कोई संतान नहीं थी ! वे बहुत खिन्न रहेते थे उपरोक्त चमत्कार को देखकर वे जब संत श्री टेकचन्दजी के संपर्क में आये तो उनके आशीर्वाद से उनकी खिन्नता दूर हुई इश्वर कृपा से एवं गुरु प्रसाद से उनके यहाँ एक पुत्र उत्पन्न हुआ ! बाद में वे संत श्री टेकचन्द जी महाराज के शिष्य हो गए और लोग उन्हें करीम भगत के नाम से जानने लगे ! उन्होंने ग्रहस्त जीवन का बिलकुल परित्याग कर दिया था ! 
           कुछ अन्तरकाल के बाद ग्राम झोंकर के ही एक परिवार ने जलन एवं द्वेष भावना से प्रेरित होकर करीम भगत की शिकायत शासन के अधिकारीयों से की की यहाँ ढोंगी , भोगी व नकली भगत है ! उस पर उन्होंने झोंकर में ही जेल (दमदमा) में बंद कर दिया गया ! ग्वालियर रियासत के समय झोंकर में थाना कचाहेरी आदि के कार्यालय थे ! जेल में करीम भगत ने अपने गुरु श्री टेकचन्दजी महाराज का स्मरण किया ! 
           वहां के अधिकारीयों ने एक दिन श्री श्री १००८ गुरु श्री टेकचन्दजी महाराज करीम भगत के रूप में इमली के पेड़ के नीचे भी भजन करते दिखाई दिए साथ ही जेल में भी , सब आश्चर्य चकित रहे गए और करीम भगत से क्षमा याचना कर उन्हें रिहा कर दिया ! 
         बाद में झोंकर में रहेते हुए इश्वर कृपा से उन्हें अचानक ही चित्त में उच्चाटन आया क्योकि वे अपनी प्रशंशा व ख्याति से हमेशा दूर रहेना चाहते थे ! ग्रान झोंकर को छोड़कर दुसरे स्थान पर जाने की इच्छा से एक दिन श्री गुरूजी ने दोनों हाथ जोड़कर सतगुरु कबीर के सम्मुख खड़े होकर प्राथना की : 
          सत्गुरु श्री कबीर के , गए सिंहासन पास
          दास जन टेकचन्द को , कार्लो अपना दास 
    प्रार्थना के बाद अद्रश्य वाणी द्वारा आवाज़ सुनाई दी : 
           सतगुरु संत कबीर ने दो उनको आवाज़ 
          जा बच्चा हो जायेगा, भारत में सिरताज 
          इतना सुनकर गुरु चल दिए पुनः उज्जैन 
          हरच हुआ मनन को बड़ा, सुनकर आगम बैन !
    जब श्री गुरुमहाराज ने सतगुरु का दर्शन कर अपने आपको अभय कर लिया तो वैशाख पूर्णिमा के दिन वि.सं . १८५० में वापस झोंकर से अवंतिकापुरी आ गए ! 
  झोंकर में पटेल साहब व अन्य भक्तों के आग्रह पर आप वि.सं. १८४७ से १८५० तक रहे ! वि.सं. १८५० में उनकी यादगार हेतु पटेल श्री गुमानसिंह जी  ने जहाँ पर संत श्री टेकचन्द जी महाराज ने समाधी ली थी उस स्थान पर एक ओटला बनवाया और उनके चरणों (पगल्या ) की स्थापना की !
    बाद में वि.सं. १९९६ (सन १९३९) में अपने ही समाज के श्री खूबचंद्रजी परमार मकोदी वालों ने धर्मार्थ एक छत्री बनवाई थी ! यहाँ छत्री उस ओटले के स्थान पर बनी हुई है ! ! प्रत्येक पूर्णिमा को भजन कीर्तन एवं शरद पूर्णिमा को शरदोत्सव होता है !
  कडछा प्रस्थान 
उज्जैन में चोमस व्यतीत करने के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को विक्रम संवत १८५० में ही आप उज्जैन से बारह मील दूर स्थित करछा में चले गए ! क्योकि आप एकांत में इश्वर भजन करना पसंद करते थे ! वहां पर श्री गुरूजी ने एक घने जंगल में खाल के पास तपस्या करने के उद्देयाश्य से अपना आसन लगाया ! धीरे धीरे वहां की करोंदियों की झड़ी को काटकर अपना एक छोटा सा आश्रम बनाया ! जहाँ रात्रि में अपने ही आश्रम में रहेते थे ! इस प्रकार चार - छह महा बीतने पर एक दिन रात्रि में ग्राम कर्चा के लोगों को उनकी आत्म  ज्योति (प्रभामंडल ) का प्रकाश दिकाही दिया ! तो वहां पुच कर देखा की एक संत महात्मा समाधिस्थ होकर अपना ध्यान लगाये हुए थे ! उस्सी रोज़ से गाँव के लोग उनके दर्शन करने जाने लगे ! और महारज ने कहा की आप यहाँ आनंद पूर्वक भजन करे ! लोगों ने कहा की हम सब आपकी सेवा में हाज़िर है ! गुरूजी ने कहा आप लोगों की जैसी इच्छा ! आप लोग भी सत्संग में आया करिए ! उस दिन से रोशन सत्संग का नियम चालू हो गया ! 
करछा
    एक दिन की घटना है - श्री टेकचन्द जी महाराज अपने ध्यान में ब्रम्हलीं होकर विराजमान थे उस समय कुछ श्रद्दालु भक्त दर्शन के लिए आये तो देखा के कदम के पेड़ के पास ध्यान में शांत मुद्रा में एक महात्मा बैठे है ! समीप पूछने पर उन भक्तों ने देखा की संत के सर पर एक बड़ा सा कला नाग अपने फेन को फैलाये हुए था ! लोगों को बड़ा आश्चर्य  हुआ और वे सब डरकर आड़ में खड़े हो गए ! इतने में ही एक भक्त गुरुमहाराज के दर्शन को आया ! यहाँ द्रश्य देख कर घबराया और बोहोत जोर से चिल्लाया तब सब एकत्रित हो आपस में चर्चा करने कगे की श्री गुरु महाराज को उनकी रक्षार्थ उन्हें सचेत कर दें ! इतने में बातों की आहात सुनकर नाग देवता संत को बिना हनी पहोचाये पास ही एक बिल में चले गए ! उस समय श्री टेकचन्दजी महारज की ध्यानस्थ मुद्रा खुली ! सभी भक्तों ने गुरूजी को प्रणाम किया और पूरी घटना का वृत्तान्त सुनाया ! संत ने कहा इसमें डरने या भय्बीत होने की क्या बात है वह सर्प भी तो इश्वर मय है ! बिना प्रभु  की इच्छा  के सर्प तो क्या पत्ता भी नहीं हिलता है ! फिर हमे इस शरीर से इतना मोह क्यों ? आप लोग निर्भय होकर प्रभु  सत्य नाम लें ! श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारे है नाथ नारायण वासुदेवा ! जिसके ह्रदय के उच्चारण मात्र से ही इच्छित फल की प्राप्ति हो जाती है ! सत्संग में आने वाले भक्तों ने गुरूजी से दीक्षा लेने की इच्छा प्रकट की तो उन्होंने वि.सं.१८५२ के शुभ महूरत में दीक्षा देने का कार्य प्रारम्भ किया ! धीरे धीरे चरों और से सत्संग के लिए लोग आने लगे !
करछा पर कृपा 
             एक दिन श्री पड़तेसिंह जी पटेल अपने गाँव करछा के लोगों के साथ गुरूजी के पास आये और कहा भगवन आपके यहाँ पधारने से आनंद ही आनंद हो रहा है ! हमारे यहाँ इंद्रदेव इतने रुष्ट थे की हमारे यहाँ फसलें चोपट हो जाती थी और पीने को पानी भी नहीं मिलता था ! जिस दिन से आपके चरण इस भूमि पर पड़े है यहाँ की काया ही पलट गई है ! आपके पधारने से जल वृष्टि हुई फसलें भी आशातीत फैली है ! नदी , तालाब , कुएं , बावड़ी सब लबालब भर गए है ! इस पर संत श्री टेकचन्दजी महाराज ने कहा इसका श्रेय मुझे कैसे यहाँ सब तो इश्वर की कृपा है इसके बाद श्री टेकचन्दजी महाराज ने चालीस दिन की अखंड समाधी लेने की इच्छा व्यक्त की जिसको सुनकर उपस्थित समुदाय ने बड़े प्रेम से कहा की महाराज आपको किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होगी हम सब मिलकर आपकी तन मन धन से सेवा करेंगे आपके इस भक्ति भाव से करछा ग्राम तथा आसपास के गाँव पवित्र हो जायेंगे बाद में भजन कीर्तन हुआ और सभी वहां से विसर्जित हो गए ! 

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